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OMG : इस देश में हर तीन वर्ष में क’ब्र से निकाली जाती हैं ला”शें, जानिए क्यों?

हिंदी खबर

नई दिल्ली. दु”निया र’ह”स्य और अ’जू”बों से भरी पड़ी है। आज भी कई जन’जा’ति’यों का जीवन’ किसी ‘ ‘से क’म न’हीं है। इंडोनेशिया की एक जन’जा’ति भी अपने उत्स’व और परंपराओं के लिए प्रसिद्ध है। य’हां सु’ला’वेसी द्वी’प की ‘ जाति’ के लो’गों का मा‘नेने फेस्टि’व’ल जित”ना अ’जी’बो ग’री’ब है उत’ना ही डरावना भी। लेकिन यहां के लोग इसे शि’द्दत से मनाते हैं। इसके तहत लोग लाशों की हर तीन वर्ष में एक बार सफाई करते हैं और उन्हें नए कप’ड़े पह’ना”’ते हैं। दरअ’स’ल, टोराजन जनजाति के लोगों का विश्वा”स है कि मौत भी एक पड़ा”व है, जिसके बाद मृतक की दूसरी यात्रा शुरू हो जाती है और इसी यात्रा के लिए उनके श”वों को सजा”या जा”ता है।

फेस्टि”वल म’ना’ने के पीछे ये है क’हा’नी
सुलावेसी में मा’नेने फे’स्टि’वल की शु’रु’आत लगभग 100 साल पहले हुई थी। गांव के ‘बुजुर्ग फेस्टिवल के पीछे की कहानी बयां करते हैं। बताते हैं, 100 साल पहले गांव में टो’राजन जनजाति का एक शिकारी शिकार के लिए जंगल आया। इ’स शि’कारी को जंग’ल में ‘एक सड़ी गली लाश देखी। उस शि”कारी ने उस शव को साफ कर अपने कप’ड़े प’हनाए और फिर उसका अंतिम संस्का’र किया। इसके बाद शिकारी के दिन फिर ग’ए। वह का’फी सु’खी और समृद्ध जीवन जीने लगा। इसी के बाद से यहां के लोग अपने पूर्वजों को सजाने की इसी प्रथा का पालन करते आ रहे हैं। मान्यता है कि ऐसा करने से उनकी आत्मा खुश होती हैं और आशीर्वाद देती हैं।

ऐसे होती है फेस्टिवल की शुरुआत
आमतौर पर ऐसा बु”’जु’र्गों की मौ”’त के बाद किया जाता है। मरने वाले बु”जु’र्ग को दफ’नाते नहीं हैं ब’ल्कि उन्हें लक’ड़ी के ताबूत में रख देते हैं और उनकी मौ”’त को ज”श्न की तरह मनाते हैं। मानता है कि मृत”’क नई यात्रा पर नि’कल गया। इसलिए उसके शव को दफनाया नहीं जाता बल्कि ताबूत में रख दिया जाता है। फिर तीन वर्ष बाद शव निका’ज़ल कर नए कपड़े पहनाए जाते हैं। उसके साथ खाना खाया जाता है और फिर उन्हें वै,से ही सुला दिया जाता है। शवों से उतरे हुए कपड़ों को परिजन पहन लेते हैं। फिर कई वर्ष बाद जब शव की हड्डियां निकलने लगतीZ उन्हें जमीन में दफना,,या जाता है।