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ए’क चुट’की चाव’ल से बद’ल सक’ती है आ’पकी कि’स्मत, ब’स क’रें ये उ’पाय, जा’निए चाव’ल से जु’ड़ी क’ई…

धार्मिक खबर

चाव’ल या’नी अ’क्षत ह’मारे ग्रं’थों में सब’से प’वित्र अना’ज मा’ना ग’या है। अ’गर पू’जा पा’ठ में कि’सी सा’मग्री की क’मी र’ह जा’ए तो उ’स सा’मग्री का स्म’रण कर’ते हु’ए चा’वल च’ढ़ाए जा स’कते हैं। कि’सी ना कि’सी साम’ग्री को कि’सी ना कि’सी भग’वान को चढ़ा’ना निषे’ध है जै’से तु’लसी को कुं’कु न’हीं च’ढ़ता औ’र शि’व को ह’ल्दी न’हीं चढ़’ती। गणे’श तो तुल’सी न’हीं चढ़’ती तो दु’र्गा को दू’र्वा न’हीं चढ़’ती लेकि’न चाव’ल ह’र भग’वान को चढ़’ते हैं।

आ’इए प’ढ़ें चा’वल से जु’ड़ी कु’छ खा’स जान’कारियां :

भग’वान को चा’वल च’ढ़ाते स’मय य’ह ध्या’न रख’ना चा’हिए कि चा’वल टू’टे हु’ए न हों। अक्ष’त पूर्ण’ता का प्रती’क है अ’त: स’भी चा’वल अखं’डित हो’ने चाहि’ए। मा’त्र 5 दा’ने चा’वल रो’ज च’ढ़ाने से अपा’र ऐ’श्वर्य की प्रा’प्ति हो’ती है।

चा’वल सा’फ ए’वं स्व’च्छ हो’ने चा’हिए। शिव’लिंग प’र चाव’ल चढ़ा’ने से शिव’जी अति’प्रसन्न हो’ते हैं औ’र भ’क्तों अखं’डित चा’वल की त’रह अखं’डित ध’न, मा’न-सम्मा’न प्रदा’न क’रते हैं।

घ’र में अन्न’पूर्णा मा’ता की प्र’तिमा को चा’वल की ढे’री प’र प’र स्थापि‍’त क’रना चा’हिए। जीव’नभर ध’न-धा’न्य की क’मी न’हीं हो’ती हैं।

पू’जन के स’मय अ’क्षत इ’स मं’त्र के सा’थ भग’वान को सम’र्पित कि’ए जा’ते हैं :

अक्ष’ताश्च सु’रश्रेष्ठ कुंक’माक्ता: सुशो’भिता:. म’या निवे’दिता भ’क्त्या: गृ’हाण पर’मेश्वर॥

इ’स मं’त्र का अ’र्थ है कि हे ई’श्वर, पू’जा में कुं’कुम के रं’ग से सु’शोभित य’ह अक्ष’त आप’को सम’र्पित क’र र’हा हूं, कृ’पया आ’प इ’से स्वी’कार क’रें।

अ’न्न में अक्ष’त या’नि चाव’ल को श्रे’ष्ठ मा’ना जा’ता है। इ’से देवा’न्न भी क’हा ग’या है। देव’ताओं का प्रि’य अ’न्न है चाव’ल। इ’से सुगं’धित द्र’व्य कुं’कुम के सा’थ आ’पको अ’र्पित क’र र’हे हैं। इ’से ग्र’हण कर आ’प भ’क्त की भाव’ना को स्वी’कार क’रें।

पू’जा में अ’क्षत च’ढ़ाने का अभि’प्राय य’ह है कि ह’मारा पू’जन अ’क्षत की तर’ह पू’र्ण हो। अ’न्न में श्रे’ष्ठ हो’ने के का’रण भग’वान को च’ढ़ाते सम’य य’ह भा’व रह’ता है कि जो कु’छ भी अ’न्न ह’में प्रा’प्त हो’ता है व’ह भग’वान की कृ’पा से ही मिल’ता है।