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कितने रुपये का, कहाँ और किस जेल में बनता है फांसी का फंदा?

कितनी होती हैं एक फांसी के फंदे की कीमत और ये  कहाँ बनते हैं ? आप लोगों ने फिल्मों में भी कई बार देखा होगा की उसमे किसी दोषी को फांसी की सजा सुनाई जाती हैं . एक जल्लाद उसके चेहरे को काले कपड़े से ढककर फंदे को गर्दन में डाल कर लीवर को ऊपर कर देता हैं. लेकिन आप में शायद कोई नहीं या बहुत कम ही लोग जानते होंगे की आखिर फांसी के फंदे की कीमत कितनी होती हैं ये कहाँ तैयार होते हैं. तो आयिए हम आपको फांसी की सज़ा से जुडी कुछ  ख़ास जानकारी देने जा रहे हैं.  

एक फांसी के फंदे की कीमत

  • राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB – National Crime Record Bureau) द्वारा जारी कुछ आंकड़ों के मुताबिक़,  भारत में अब तक करीब 1500 अपराधियों को  फांसी की सजा सुनाई जा चुकी हैं. 
  •  इनमें से 21 अपराधी ऐसे हैं,  जिन्हें फांसी के फंदे पर लटकाया जा चुका हैं .
  • बक्र जेल सुपरिटेंडेंट ने बताया कि  फांसी का फंदा 2016 में पटियाला जेल को सप्लाई किया गया था।  उस वक़्त उसकी कीमत 1,725 रुपये हुआ करती थी. 
  • उन्होंने बताया कि अब महंगाई बढ़ गई हैं , और  फंदा बनाने वाले धागे और सूत के दाम भी बढ़ गए हैं .  इसी के साथ गर्दन में फंसाने के लिए तैयार होने वाले पीतल के बुश की कीमत भी बढ़ गयी हैं . इसलिए अब इस एक फंदे की कीमत 2,120 रुपये हो गयी हैं.

आखिर बक्सर में ही क्यों बनते हैं?

  • जिस तरह किसी को फांसी की सजा बड़ी विरले मिलती हैं , उसी तरह फांसी के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला फंदा भी पूरे देश में केवल एक ही जगह बनता हैं. 
  • बिहार का बक्सर केंद्रीय कारागार (Buxar Central Jail)

  • बक्सर जेल के सुपरिटेंडेंट विजय कुमार अरोड़ा ने बताया कि ‘इंडियन फैक्ट्री लॉ के हिसाब से बक्सर सेंट्रल जेल को छोड़ दूसरी जगहों पर फांसी के फंदे बनाने पर प्रतिबंध लगा हुआ है। पूरे भारत में इसके लिए केवल एक ही जगह पर मशीन लगाई गई है और वो सेंट्रल जेल बक्सर में ही हैं । ये आज से नहीं बल्कि अंग्रेजों के समय से है।’‘
  • ‘बक्सर सेंट्रल जेल गंगा के किनारे है।  

कैसे तैयार होता हैं फंदा

  • फांसी का फंदा बनाने वाली रस्सी बहुत मुलायम होती है। उसमें इस्तेमाल किए जाने वाले सूत को अधिक नमी की जरूरत होती हैं . शायद इसिलए ये मशीन गंगा के किनारे हैं. 
  • ‘हालांकि अब सूत को मुलायम और नम करने की जरूरत नहीं पड़ती। सप्लायर्स रेडिमेड सूत ही सप्लाई करते हैं।’
  • जेल सुपरिटेंडेंट विजय कुमार अरोड़ा ने बताया कि फांसी का फंदा बनाने के लिए जिस सूत का इस्तेमाल होता है, उसका नाम J34 हैं.  
  • पहले यह सूत ख़ास तौर पर पंजाब से ही मंगाया जाता था, लेकिन अब सप्लायर्स ही देते हैं।
  • ‘यह मुख्य रूप से हाथ का काम होता हैं । मशीन से केवल धागों को लपेटने का काम किया जाता हैं । 154 सूत का एक लट बनाया जाता है,  छह लट बनते हैं। इन लटों से 7200 धागे या रेशे निकलते हैं। इन सभी धागों को मिलाकर 16 फीट लंबी रस्सी बनती है।’
  • जेलर सतीश कुमार सिंह के मुताबिक फंदा बनाने का अंतिम चरण सबसे महत्वपूर्ण होता हैं.
  • उनका कहना हैं कि , ‘जब एक बार हम यहां से रस्सी बनाकर भेज देते हैं, तो फिर उसकी फिनिशिंग का काम होता है। इसमें रस्सी को मुलायम और नरम बनाना शामिल है। क्योंकि नियमों के मुताबिक फांसी के फंदे से केवल मौत होनी चाहिए। चोट का एक भी निशान नहीं रहना चाहिए।’
  • बक्सर जेल के कैदी ही इसे बनाने का काम करते हैं.

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