Categories
News

उत्तराखंड में नंदा देवी ग्लेशियर टूटने से हुआ हिमस्खलन

7 फरवरी को चमोली जिले उत्तराखंड में नंदा देवी ग्लेशियर टूटने से हुआ हिमस्खलन. ग्लेशियर के टूटने से धौलीगंगा, ऋषिगंगा और अलकनंदा नदियों में अचानक आई बाढ़ से पर्वतीय क्षेत्र में बहुत तबाही हुई. एनटीपीसी के तपोवन-विष्णुगढ़ जल विद्युत् प्रोजेक्ट और ऋषिगंगा जल विद्दुत प्रोजेक्ट को भारी नुकशान हुआ. प्रोजेक्ट में काम कर रहे मजदूरों के टनल में फसे होने और लापता होने की सुचना मिलने पर कुछ लोगो को टनल से निकाला जा चूका है कठिन परिस्थितियों में भी हिमालय के पहाड़ी भू-भाग में बचाव कार्य जारी है.

प्रधानमंत्री ने प्रधानमंत्री राष्ट्रिय राहत कोष से अनुग्रह राशि देने की घोषणा भी की है.हादसे में जान गवाने वाले प्रत्येक व्यक्ति के परिजनों को 2 लाख रुपए की स्वीकृति मिलेगी.

नंदा देवी ग्लेशियर हादसे से जुड़ी कुछ महत्वपूर्ण बातें – नंदा देवी ग्लेशियर हादसे के अध्ययन के लिए ग्लेशियर विशेषज्ञों की टीम जोशीमठ- तपोवन के लिए रवाना हुई. यह टीम हिमालय, ग्लेशियरों और इस क्षेत्र में होने वाले भूकंप गतिविधियों का अध्ययन करेगी.

पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील हिमालय जलवायु परिवर्तन के लिए अति संवदेनशील है. 2019 में भारत, चीन, नेपाल और भूटान के ग्लेशियरों के उपग्रह अवलोकन से जुड़ा अध्ययन प्रकाशित किया गया. 40 साल तक किये गये उपग्रह अवलोकन में हिमालय के ग्लेशियरों के पिघलने के लिए जलवायु परिवर्तन को जिम्मेदार माना गया है.विशेषज्ञों का कहना है की तापमान में वृद्धि के कारण ग्लेशियर काफी पिघल रहे है.

आखिर ग्लेशियर है क्या- हिम का जो भू – भाग पर धीरे -धीरे बहता रहता है उस ग्लेशियर को हिमनद कहा जाता है ग्लेशियरों का निर्माण अत्याधिक बर्फ के जमने के कारण होता है ग्लेशियर के निर्माण में बर्फबारी का भी योगदान होता है धौलीगंगा का उदगम वसुंधरा ताल से हुआ है, वसुधरा ताल उत्तराखंड में स्थित हिमनद झील है यह नदी नंदादेवी राष्ट्रिय उद्दान से होकर बहती है ऋषिगंगा नदी रैनी नामक स्थान पर धौलीगंगा में आकर मिलती है तपोवन से बहती हुई धौलीगंगा जोशीमठ के पास विष्णुप्रयाग नामक स्थान पर अलकनंदा नदी में मिल जाती है अलकनंदा चमोली, मैथाना, नंदप्रयाग और कर्णप्रयाग से होकर बहती है मंदाकिनी नदी रुद्रप्रयाग में अलकनंदा में मिलती है. केदारनाथ के पास अलकनंदा, देवप्रयाग में गंगा नदी में मिल जाती है हिमालय से निकल कर बहने वाली नदियों पर बनने वाले बाँध और जल विद्दयुत प्रोजेक्ट इनके अस्तित्व के लिए सबसे बड़ा खतरा है.