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DNA ANALYSIS: सुशांत केस में टूटे मीडिया ट्रायल के सारे रिकॉर्ड, पीएम मोदी ने याद दिलाई मर्यादा…

हिंदी वायरल खबर

नई दिल्ली: सुशांत (Sushant Singh Rajput) मामले में मीडिया ट्रायल (Media Trial) को लेकर भी एक नई बहस छिड़ गई है. अलग-अलग न्यूज़ चैनल अलग-अलग तरीके से इस मामले को कवर कर रहे हैं और मीडिया ट्रायल चल रहा है. ऐसा लगता है अब अदालत की कोई जरूरत नहीं, इंवेस्टिगेटिव एजेंसियों की कोई जरूरत नहीं. बड़े-बड़े चैनलों के न्यूजरूम और टीवी स्टूडियो में सारी की सारी जांच इस वक्त चल रही है. जिस तरह की भाषा की प्रयोग किया जा रहा है, वो बहुत नीचे गिर गई है और अब देश के परिवार न्यूज़ चैनलों को लेकर ये कहने लगे हैं कि छोटे बच्चों के सामने न्यूज चैनल नहीं देखना चाहिए. 

पीएम मोदी ने याद दिलाई मर्यादा
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) ने कल इशारों-इशारों में मीडिया को उसकी मर्यादा की याद दिलाई. प्रधानमंत्री ने कहा कि सोशल मीडिया के युग में अब मीडिया की भी आलोचना होने लगी है. इन आलोचनाओं से मीडिया को सीखना चाहिए. प्रधानमंत्री का यह बयान बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि पूरे देश में इन दिनों मीडिया को लेकर एक तरह का नकारात्मक माहौल बना हुआ है. टीआरपी के नाम पर पिछले कुछ दिनों में भारतीय मीडिया ने बार-बार मर्यादाओं की लक्ष्मण रेखा को पार किया है. कभी चीन के मुद्दे पर, तो कभी सुशांत सिंह राजपूत को लेकर भारतीय मीडिया के एक वर्ग ने बेहद गैर-जिम्मेदार रिपोर्टिंग की. मीडिया की इस भूमिका को लेकर जनता के बीच में भी एक बहस छिड़ी हुई है. प्रधानमंत्री ने आज जो कुछ कहा है, उसमें उन्होंने जनता की उन्हीं भावनाओं को व्यक्त किया है.

नैतिकता की सारी सीमाएं लांघ दी
अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत के मामले में आप देख रहे होंगे कि कैसे कई न्यूज चैनल खबरों के नाम पर नैतिकता की सारी सीमाएं लांघ रहे हैं. मीडिया की एक मर्यादा होती है. लेकिन खबरों को मसालेदार बनाने के लिए और बिकाऊ बनाने के लिए न्यूज चैनलों ने मीडिया की मर्यादाओं की धज्जियां उड़ा दीं. इन दिनों कई न्यूज चैनलों पर खुलेआम गालियां दी जाती हैं. अपशब्दों का प्रयोग किया जाता है. हो सकता है आपने भी कई चैनलों पर अपशब्द सुने होंगे. एक सभ्य समाज में एक जिम्मेदार परिवार में अपशब्दों की कोई जगह नहीं होती. इसीलिए हमें उम्मीद है कि ऐसी टेलीविजन पत्रकारिता के बारे में आपकी राय भी ऐसी ही होगी, जैसी हमारी राय है.

न्यूज चैनलों को भी A सर्टिफिकेट नहीं मिलना चाहिए?
मुझे लगता है कि हमारे देश के न्यूज चैनल अब ऐसे नहीं रह गए हैं जिसे पूरे परिवार के साथ आप देख सकें. क्योंकि डर लगा रहता है कि कब न्यूज चैनल पर खबरों के नाम पर अश्लीलता देखने को मिले. अपशब्द सुनाई देने लगे. अब मेरा सवाल ये है कि क्या न्यूज चैनलों को भी A सर्टिफिकेट नहीं मिलना चाहिए?

मीडिया ट्रायल की परंपरा
हमारे देश में किसी भी मामले पर मीडिया ट्रायल की परंपरा है. सुशांत सिंह राजपूत की मौत का भी मीडिया ट्रायल हो रहा है. रिपोर्टर, आरोपी के बेडरूम में घुसने की कोशिश कर रहे हैं. रास्ते में रोक रहे हैं. हाथ में माइक लेकर कैमरे के सामने मारपीट और गुंडागर्दी कर रहे हैं. अब आप सोचिए कि आखिर ये किस तरह की पत्रकारिता है.

न्यूज चैनल की भाषा
अब राजनीति इस बात पर चल रही है कि मुंबई किसकी है. ये सबकुछ सुशांत सिंह राजपूत के न्याय के नाम पर हो रहा है और खबरों के नाम पर इस तरह के तमाशे को दिखाने वाले चैनलों की रेटिंग भी छप्पर फाड़ के आ रही है. अगर रेटिंग ही पैमाना है तो इसका मतलब हुआ कि देश के ज्यादातर दर्शकों को इस तरह की मसालेदार और तथ्यहीन खबरें पसंद आ रही हैं. क्या देश के दर्शकों ने इस तरह की मसालेदार और अश्लीलता को स्वीकार कर लिया है? क्या अश्लीलता और अपशब्द किसी न्यूज चैनल की भाषा में शामिल होने चाहिए.