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च’मत्का’र: भारत के वो मं’दिर,जहॉ भ’गवान की मू’र्तियों से निकलता है प’सीना…👇

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हम जिस दु’नि’या में रह रहे हैं, वह दु’नियां कई अ’द्भु’त र’ह’स्यों से भ’री पड़ी है। दु’नि’या में कई रह’स्यम’यी चीजें हैं, जि’नका ज’वा’ब आज तक वै’ज्ञानि’कों के पास भी नहीं है। आइए आज हम आ’पको दु’निया के ऐसे दो मं’दिरों के बारे में बताते हैं, जहां भ’गवा’न की मू’र्ति से प’सी’ना नि’कल’ता है और इ’सके पीछे की प’हे’ली बु’झाने में आ’ज तक कोई भी स’फ’ल नहीं हो सका।

सि’क्क’ल सिं’गारवे’लावर
त’मिलना’डु में का’र्तिके’य मु’रु’गा के सि’क्क’ल सिं’गारवे’लावर मं’दिर में हर सा’ल अक्टूबर से नवंबर के बीच में एक उ’त्सव का आ’योज’न किया जाता है। इस उ’त्सव के दौ’रान भग’वान सु’ब्रम’ण्य की मू’र्ति से प’सी’ना निकलता है। यह उत्सव भगवान सु’ब्रमण्य की रा’क्ष’स सु’रा’पद’मन पर जी’त की खुशी में म’ना’या जाता है।

हिं’दू ग्रं’थों के मु’ता’बि’क यह प’सीना सुब्रमण्य के क्रो’ध का प्र’ती’क है, जो उन्’हें सु’रापदम’न को मारने के इं’तजा’र में आता है। ऐसी मा’न्य’ता है कि जैसे-जैसे यह उ’त्सव स’माप्त होने को आता है, वैसे-वैसे सु’ब्रम’ण्य की मू’र्ति का प’सी’ना कम होने ल’ग’ता है। इस प’सीने को मंदिर के पु’जारी पा’नी जल के तौ’र पर भ’क्तों पर छि’ड़क’ते हैं। कहा जाता है कि शरीर पर यह छिड़काव पड़ने पर शा’रीरि’क पी’ड़ा कम होने के साथ-साथ जीवन में सु’ख की प्रा’प्ति होती है।

भ’ले’ई माता
ऐसा ही एक मं’दिर दे’वभू’मि कहे जाने वाले हि’माच’ल प्र’देश के चं’बा जिले में मि’लता है। चंबा जिले से करीब 40 किलोमीटर की दूरी पर श’क्ति’पी’ठ भ’लेई मा’ता का मं’दि’र है, जो दे’वी भ’द्रका’ली को स’मर्पि’त है। यह मं’दिर सै’क’ड़ों सा’ल पुराना है। यहां के पुजारी बताते हैं कि भ’लेई माता की मू’र्ति प्र’क’ट हुई थी, जिसके बाद मंदिर का निर्माण किया गया। पुजारी ये भी बताते हैं कि कई बार मूर्ति से पसीना निकलने का रहस्य जानने के लिए वै’ज्ञानि’कों ने भी खोज की, लेकिन उन्हें खाली हाथ लौटना पड़ा। ऐसी मान्यता है कि जिस समय मूर्ति से पसीना निकलता है, उस वक्त भक्तों द्वारा जो भी म’नोका’मना मां’गी जाती हैं, वो पूरी जरूर होती है।