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सीएम योगी का असली नाम योगी आदित्यनाथ नहीं बल्कि ये है!

सोमवार को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के पिता आनंद सिंह विष्ट का निधन हो गया।इस समय उनसे जुड़े उस संस्मरण की खूब चर्चा है, जिसमें उन्होंने कलेजे पर पत्थर रख बेटे को नाथ पीठ के लिए समर्पित कर दिया था। आज जो उत्तर प्रदेश के सीएम हैं उनका असली नाम योगी आदित्यनाथ नहीं बल्कि कुछ और है।

बात दें योगी आदित्यनाथ का असली नाम अजय सिंह विष्ट है। साल 1993 में अजय अपनी मां सावित्री देवी से अनुमति लेकर अपने गाँव पंचूर (पौड़ी गढ़वाल) से गोरखपुर के लिए निकले थे। मां ने अनुमति यह सोचकर दे दी कि बेटा शायद नौकरी की तलाश में जा रहा है लेकिन जान छः महीने तक बेटे की कोई ख़बर नहि आयी तो घरवाले परेशान हो गये।

कैसे और कब बदला नाम

जब छः महीने तक बेटे अजय की कोई ख़बर नहीं आयी तो दिल्ली में बसी उनकी बड़ी बहन पुष्पा ने पिता को गोरखनाथ मंदिर जाने की सलाह दी। उन्होंने बताया कि अखबार में खबर थी कि गोरक्षपीठाधीश्वर ने अपने उत्तराधिकारी की घोषणा कर दी है। योगी आदित्यनाथ नाम के उत्तराधिकारी पौड़ी गढ़वाल के रहने वाले हैं। जब पिता आनंद सिंह विष्ट गोरखनाथ मंदिर पहुंचे तो उन्होंने देखा कि भगवा वस्त्र में एक संन्यासी फर्श की सफाई कार्य का मुआयना कर रहा था। पास पहुंचे तो वह अवाक रह गए क्यंकि वो कोई और नहीं बल्कि उनका बेटा अजय था। उन्होंने अजय को बोला यहाँ से तत्काल चलो।

योगी ने अपने पिता को समझाया और मंदिर कार्यालय ले गए। महंत अवेद्यनाथ उस समय मंदिर में नहीं थे, उन्हें सूचना दी गई तो उन्होंने फोन पर उनसे बात की और चार पुत्रों में से एक को समाज सेवा के लिए समर्पित करने का अनुरोध किया। आनंद सिंह विष्ट कुछ बोल नहीं सके और गांव लौट गए। बता दें फरवरी 1994 को अजय सिंह विष्ट दीक्षा लेकर बाकायदा योगी आदित्यनाथ बने थे।

भिक्षा देकर पूरा किया योगी बनने का विधान

जब आनंद सिंह विष्ट घर पहुँचे तो उन्होंने पत्नी को बेटे की पूरी बात बताई। मां के दिल को यकीन नहीं हुआ और पति के साथ गोरखपुर पहुंच गईं।जब बेटे को संन्यासी रूप में देख वह फूट-फूट कर रोने लगीं। योगी ने भावनाओं को काबू में रख माता-पिता से कहा, छोटे परिवार से एक बड़े परिवार में उनका मिलन संन्यासी के रूप में हुआ है।

योगी आदित्यनाथ बनने के दो वर्ष बाद उन्होंने अपने गांव की पहली यात्रा की। यह यात्रा माता-पिता से भिक्षा लेने के विधान को पूरा करने के लिए थी। माता-पिता ने भिक्षा में चावल, फल और सिक्का दिया। उसके बाद पिता आनंद सिंह विष्ट एक-दो बार और गोरखपुर आए, लेकिन उन्होंने अपने पुत्र को महाराज कहकर संबोधित किया। इस प्रकरण का जिक्र कई लेखकों ने अपनी पुस्तक में किया है।

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